| यह सिर्फ collection मुझे पसंद आया इसलिए दोस्तों के लिए यह रखा है... आशा है आपको भी पसंद आएगा .... दुर्व्यवहार के प्रायश्चित का समय |
| Written by डा. महीप सिंह |
| Tuesday, 22 November 2011 03:23 |
कुछ वर्ष पहले मैंने एक लेख लिखा था, ‘स्वागत योग्य है क्षमा याचना का यह रुझान.’ मनुष्य जाति का इतिहास अन्याय, अत्याचार, उत्पीड़न, नरसंहार से भरा हुआ है. बाहुबल, सैन्य शक्ति, शासन तंत्र, धर्म और नीति की व्यवस्था आदि अनेक कारणों से विशिष्ट वर्ग साधनहीन व दुर्बल व्यक्तियों और समूहों पर अन्याय-अत्याचार करते आए हैं और निरीह लोग उन्हें सहते आए हैं. किन्तु अब समय बदला है. विशिष्ट वर्ग के इस रवैये के खिलाफ पीड़ित लोग उठे हैं और उन्होंने अपने अधिकार प्राप्ति के लिए अनेकमुखी संघर्षों को जन्म दिया है. एक रुझान और उभरा है. सदियों तक अन्याय और शोषण करने वाली शक्तियों ने सम्पूर्ण संसार में उभरती हुई लोकतांत्रिक भावना और मानवीय समता की प्राप्ति के जनान्दोलनों को अनुभव करते हुए अपनी नीतियों में परिवर्तन किया और उन लोगों, समूहों, देशों से क्षमा याचना की जो लम्बे समय तक उनके हाथों पीड़ित हुए. इसका सबसे ताजा उदाहरण कनाडा में दिखाई दिया. कनाडा की धरती पर जब यूरोपीय गोरी जातियों ने अपना आधिपत्य स्थापित कर लिया तो वहां के मूल निवासियों को जंगलों-पहाड़ों में खदेड़ दिया और जो बचे, उन्हें अपने रंग में रंगने, उनकी सांस्कृतिक पहचान नष्ट करके उन्हें यूरोपीय ढंग से जीने-सोचने का अभियान प्रारम्भ किया. कनाडा के गोरे सिपाही आदिवासियों के घरों में घुस उनके बच्चों को बलात उठा ले जाते थे. उन्हें विशेष रूप से बनाये गये बंदीगृहों में रखा जाता था और अपने माता-पिता तक से नहीं मिलने दिया जाता था. वे बच्चे अपनी भाषा में बातचीत नहीं कर सकते थे. यानी उनकी पूरी तरह ब्रेनवाशिंग की जाती थी. कनाडा में यह स्थिति लम्बे समय तक बनी रही. फिर वहां के लोगों में स्थानीय आदिवासियों के प्रति किए जा रहे अन्याय के प्रति जागरूकता पैदा होनी शुरू हुई. वहां की संसद में ऐसे अनेक लोग चुनकर आएं जिन्होंने सरकार पर दबाव डाला कि इस प्रकार का अन्याय बंद किया जाए और जो अन्याय हो चुका है, उसके लिए आदिवासी समूह से क्षमा याचना की जाए. वहां की सरकार ने यह बात स्वीकार कर ली. तीन वर्ष पूर्व (2008) में कनाडा के प्रधानमंत्री ने भरी संसद में, अनेक आदिवासी प्रतिनिधियों की उपस्थिति में, आदिवासियों पर किए गए अन्याय और अत्याचार के लिए क्षमा याचना की. यह क्षमा-याचना कनाडा की अधिकृत दो सरकारी भाषाओं-अंग्रेजी और फ्रांसीसी के साथ ही आदिवासियों की अपनी भाषा में भी की गई. क्षमा-याचना के प्रस्ताव को संसद में सर्वसम्मति से करतल ध्वनि से स्वीकार किया गया. इस देश में दलित जातियों के प्रति जो अमानवीय व्यवहार सदियों से होता रहा है क्या उसकी समकक्षता कहीं ढूंढ़ी जा सकती है? यहां का समाज पशुओं की पूजा करता रहा है. किन्तु मनुष्य रूप में जन्मे व्यक्ति की छाया मात्र पड़ जाने से बौखला उठता है. विडम्बना यह है कि अपने आपको उच्च वर्ण का समझने वाले समाज ने अपने सभी उत्पीड़न भरे कार्यो को धर्मसम्मत और नीति सम्मत ठहराने के लिए ऐसे शास्त्रों-स्मृतियों की रचना की जिनके माध्यम से सभी प्रकार की प्रताड़ना और अत्याचार को न्यायोचित ठहराया गया और अपराध बोध की कहीं कोई गुंजाइश नहीं रखी गई. सम्पूर्ण मानव इतिहास में ऐसी स्थिति बेजोड़ है. वर्ण व्यवस्था द्वारा पोषित असमतामूलक समाज के विरुद्ध मानवीय समता के लिए अभियान ढाई हजार वर्ष पूर्व महात्मा बुद्ध के समय से प्रारम्भ हो गया था. मध्य काल के निगरुण संतों ने बहुत मुखर होकर इस व्यवस्था की र्भत्सना की और स्पष्ट घोषणा की- जात-पात पूछे नहि कोई. हरि को भजै सो हरि का होई. किन्तु व्यापक समाज पर इसका विशेष प्रभाव नहीं पड़ा. दलित वर्ग की व्यथा लगभग वैसी ही बनी रही. उत्पीड़न, अन्याय, अत्याचार और घृणा भरे व्यवहार का जो सिलसिला सालों पहले आरम्भ हुआ था, उसमें आंशिक ही कमी आयी. आज भी ऐसे उदाहरण मिलते हैं जब दलित समाज का कोई व्यक्ति इस अन्याय के विरुद्ध आवाज उठाता है तो सवर्ण समाज उसे शारीरिक-मानसिक रूप से बुरी तरह दंडित करता है, उसके समाज की सामूहिक हत्याएं की जाती हैं, उनकी बस्तियां जला दी जाती हैं. संवैधानिक प्रावधानों, लोकतंत्र की व्यवस्थाओं, शिक्षा के प्रसार और दलित समाज में आती जागरूकता के कारण जो परिवर्तन आ रहा है उससे नाक-भौंह चढ़ाने वालों की गिनती भी कम नहीं है. आज भी ऐसे लोग हैं कि यदि उनका कुत्ता किसी दलित परिवार के घर की रोटी भी खा लें तो वह अस्पृश्य हो जाता है. कुछ वर्ष पहले मैंने प्रख्यात समाजशास्त्री एम.एन. श्रीनिवास का एक लेख पढ़ा था- ‘जातियां-क्या भविष्य के भारत में उनका अस्तित्व रहेगा?’ यह लेख उन्होंने छठे दशक में लिखा था, जब इस देश को स्वतंत्रता प्राप्त किए मुश्किल से दस वर्ष हुए थे. उस लेख के कुछ शब्द मैं यहां उद्धृत कर रहा हूं- ‘कुछ पढ़े-लिखे सम्पन्न दलित अस्पृश्यता-विरोधी कानून को प्रभावशाली बनाने के लिए प्रयास करते रहते हैं. इसी कारण उस कानून का कुछ असर भी है. पर यह उनके लिए सरल काम नहीं है. स्वाभाविक रूप से उनके प्रयासों से सवर्ण हिन्दुओं और दलितों में तनाव बढ़ा है. पर इसके बढ़े बिना और शायद बिना मारपीट और खून-खराबे के संविधान में प्रदत्त दलितों के अधिकारों को कभी साकार रूप भी नहीं मिलेगा. यदि भविष्य में इस तरह की लड़ाइयां गांवों में और ज्यादा संख्या में हों तो मुझे कोई आश्चर्य नहीं होगा. जैसे-जैसे दलित ज्यादा शिक्षित होते जाएंगे और उनकी आर्थिक दशा में सुधार होगा, वे बहुसंख्यक हिन्दुओं द्वारा कठोरता से लागू आदेशों के कारण उत्पन्न पंगुता का अधिक विरोध करेंगे. यह हिन्दू वर्ग दलितों की मांगों के प्रति सम्मानपूर्वक सहमत नहीं होगा और इस समस्या के प्रति सामान्य जनता में जागरूकता तभी आएगी जब लड़ाइयां और खून-खराबा होगा और तभी इन समस्याओं पर, जो आज समाजशास्त्रियों और सामाजिक कार्यकर्ताओं की चर्चा का विषय है, हर जगह सड़कों, चाय दुकानों और बरामदों में बातें होंगी.’ डॉ. श्रीनिवास ने जो बात लगभग पांच दशक पहले कही थी, वह इस अवधि में निरन्तर चरितार्थ हुई है. दलित जातियों पर इस देश में उतने ही लम्बे समय से अमानवीय अत्याचार हो रहे हैं, जितना लम्बा इस देश का इतिहास है. अंतर केवल इतना है कि इस लम्बी अवधि में इस वर्ग को अपने प्रति किये गये अन्याय की अनुभूति लगभग संवेदनहीन स्थिति पर थी, किन्तु आज वे संवेदनशील हो रहे हैं और मात्र व्यक्ति स्तर पर नहीं, बल्कि सामूहिक रूप से इसके विरुद्ध बोलने की हिम्मत जुटा रहे हैं. क्या यह समय प्रायश्चित का नहीं है? क्या आज के जागरूक समाज का यह दायित्व नहीं है कि वह इस अभियान का सहभागी बने कि दलित समाज के प्रति दीर्घकाल से जो र्दुव्यावहार होता रहा है, उसके लिए उससे क्षमायाचना की जाए. समयलाइव. कॉम से साभार |
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